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You searched for: subject:"आलोचना"
[texts]आलोचना और समाज - प्रफुल्ल कोलख्यान
समाज में पहले से व्याप्त यौनमूलक भेद-भाव और शोषण का सहारा लेकर विकृतिकरण का यह प्रयास अधिक समतामूलक दीखने और अपनी वैधता साबित करने में सफल हो जाता है।... बाजार, धर्म, काम और भाषा की आत्मिक संश्ल...
Keywords: कोलख्यान; समाज; आलोचना; kolkhyan
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[texts]माँ का क्या होगा - प्रफुल्ल कोलख्यान
माँ का क्या होगा ?? लोभ की चपेट में फँसकर ऐसा समाज विकसित होता जा रहा है जिसमें न बूढों के लिए सच्चा आदर बचा है न बच्चों के लिए सच्चा स्नेह। ऐसा समाज न सिर्फ परंपराओं की अच्छाइयों से विमुख होता है...
Keywords: कोलख्यान; समाज; आलोचना; हिंदी; kolkhyan
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[texts]अस्मिता क्या और क्यों - प्रफुल्ल कोलख्यान
नव-सामाजिक आंदोलनों की खासियत यह है कि ये अस्मिता के सवाल को तो उठाते हैं, लेकिन उसके वर्गीय आधार को नकारते  हैं। बल्कि ये अपने को सामाजिक दायरे के नाम पर आर्थिक और राजनीतिक प्रसंग को अपने लिए ...
Keywords: कोलख्यान; अस्मिता; आलोचना; kolkhyan; hindi
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[texts]इनकार का हक और हक का इनकार - प्रफुल्ल कोलख्यान
मकान बनाने की ललक बढ़ी है। घर बसाने की ईहा कम हुई है। तलाक की घटना की संख्या में चिंतनीय वृद्धि हुई है। इन्हें जीवन-यापन में स्थायित्व के अवसरों की कमी से भी जोड़कर देखा जा सकता है। ......
Keywords: कोलख्यान; नैतिक; आलोचना; kolkhyan; hindi
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[texts]आलोचना विवेक और इतिहास के सवाल - प्रफुल्ल कोलख्यान
चाहे जितनी सावधानी बरती जाये, अंतत: परंपरा ‘पवित्र वन’ ही ठहर जाती है। जड़ी-बूटियों से भरा ऐसा ‘पवित्र वन’ जहाँ हर झाड़-झँखार ‘संजीवनी’ प्रतीत होती है। यह प्रतीति कदम-कदम पर भरमाती है। इस प्रत...
Keywords: कोलख्यान; आलोचना; नया; हिंदी; kolkhyan
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[texts]डर, जो बाहर भी है और भीतर भी - प्रफुल्ल कोलख्यान
डर एक संदेश भी है इन दिनों। डर का संदेश हो जाना इसलिए भी त्रासद है कि एक समय चित्त की भय-शून्यता की कामना विश्व कवि रवींद्रनाथ के ठाकुर के काव्य में उतरकर कोलकाता ही नहीं, बंगाल ही नहीं, भारत ही न...
Keywords: kolkhyan; hindi; कोलख्यान; निशांत; आलोचना
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[texts]इतिहास से आती लालटेनों की मद्धिम रोशनियाँ - प्रफुल्ल कोलख्यान
मानव सभ्यता की लंबी यात्रा में, अबौद्धिकता का जोखिम उठाते हुए भी, सुकुमार सपनों का सनातन निवास कविता ही रही है। कविता में जीवन के यथार्थ के प्रति सलूक का अपना सलीका होता है। हमारे समय में इस सभ...
Keywords: kolkhyan; hindi; vimlesh; कोलख्यान; आलोचना
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[texts]आलोचना की संस्कृति - प्रफुल्ल कोलख्यान
जीवन-विवेक न उभय-निष्क्रियता की बात करता है और न निष्पक्षता की। ऐसा इसलिए कि विषम समाज अपनी निर्मिति में ही पक्षपातपूर्ण होता है। पक्षपातपूर्ण वातावरण में, निष्पक्षता चालू पक्षपातपूर्ण व्य...
Keywords: कोलख्यान; संस्कृति; आलोचना; kolkhyan; hindi
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[texts]पाठक और साहित्य - प्रफुल्ल कोलख्यान
सामाजिकता परस्पर-निर्भरता से ही संरक्षित हेती है। यह परस्पर-निर्भरता जितनी अमूर्त होती है सामाजिकता भी उसी आनुपात में अमूर्त होती जाती है। विज्ञान के विकास से मनुष्य और उसकी जीवन-चर्या के स...
Keywords: कोलख्यान; आलोचना; पाठक; kolkhyan; hindi
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[texts]जल बीच मीन पियासी - प्रफुल्ल कोलख्यान
यह बिल्कुल निराधार आशंका नहीं है कि जिनके हित में आंतरिक उपनिवेश का बने रहना ही जरूरी था उन्हीं के हाथों में बाहरी उपनिवेश से मुक्ति के नेतृत्व का होना इस आत्मघात का प्रमुख कारण बना। तात्पर्...
Keywords: कोलख्यान; स्त्री-विमर्श; आलोचना; हिंदी; kolkhyan; hindi
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[texts]जीवन के दिन-रैन का, कैसे लगे हिसाब - प्रफुल्ल कोलख्यान
कभी-कभी छोटी मछलियों को निगलना जितना आसान होता है उसे हजम करना उतना ही मुश्किल होता है। बहुराष्ट्रीय पूँजी की दुष्टताएँ अंतत: राष्ट्रीय पूँजी को विषाक्त बना देती हैं। दक्षिणपंथ का भूमंडलीक...
Keywords: कोलख्यान; कट्टरता; अरुण; आलोचना; हिंदी; kolkhyan; hindi
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[texts]एक आदमी के ज़िद की आंतरिक रिपोर्ट - प्रफुल्ल कोलख्यान
कथातीत कथ्य और संवेदनातीत समझ का प्रभावशील साहित्यिक महत्त्व बन नहीं पाता है। प्रगतिशील और प्रगतिरोधी शक्तियों के अंतर्द्वंद्व को सामने लाने के अपने रचनात्मक संकल्प तो हैं लेकिन, कथ्य के क...
Keywords: कोलख्यान; दूधनाथ; उपन्यास; आलोचना; हिंदी; kolkhyan; hindi
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[texts]साहित्य का समाज शास्त्र - प्रफुल्ल कोलख्यान
‘मधुरी बानी’ बोलनेवाली उदारीकरण-निजीकरण-भूमंडलीकरण की वैश्विक प्रक्रिया के अंतर्गत विकसित ‘तिरगुन फाँस’ राष्ट्र और राज्यव्यवस्था की विफलताओं के हवाले से सभ्यता संररचना की मौलिक इकाई के ...
Keywords: कोलख्यान; आलोचना; साहित्य; समाज; शास्त्र; kolkhyan; hindi
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[texts]अंतिम क्षण में जनतंत्र - प्रफुल्ल कोलख्यान
बिना किसी आदर्श के, बिना किसी नायक के किसी सामाजिकता की गत्यात्मकाता में आत्मीयता का कोई प्रसंग नहीं जुड़ता है। इसका एक कारण यह है कि आदर्श और नायक से ही लोगों के मनोजगत का तादात्मीयकरण संभव ह...
Keywords: कोलख्यान; जनतंत्र; आलोचना; प्रेमचंद; रघुवीर; kolkhyan; hindi
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[texts]जीने के लिए चाहिए सारे-के-सारे औजार - प्रफुल्ल कोलख्यान
कविता को चाहिए उदास जीवन के अंत:करण में बची हुई करुणा का अंतिम राग। कविता को चाहिए ग्लेशियर की आत्मा में सोई हुई आग की अंतिम लौ। कविता को चाहिए प्रथम और प्रथमा के अद्वैत प्रगाढ़ आलिंगन की पहली ...
Keywords: कोलख्यान; कविता; आलोचना; अनिमेष; हिंदी; kolkhyan; hindi
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[texts]आलोचना की संस्कृति - प्रफुल्ल कोलख्यान
जीवन-विवेक न उभय-निष्क्रियता की बात करता है और न निष्पक्षता का। ऐसा इसलिए कि विषम समाज अपनी निर्मिति में ही पक्षपातपूर्ण होता है। पक्षपातपूर्ण वातावरण में, निष्पक्षता चालू पक्षपातपूर्ण व्य...
Keywords: कोलख्यान; आलोचना; संस्कृति; kolkhyan; alochana; hindi
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[texts]दुःस्साध्य भाषिक कारीगरीः क़िस्सा कोताह - प्रफुल्ल कोलख्यान
जीवन में बदलाव की बयार बह रही है। साहित्य में इस बयार से एक नए तरह का वातावरण बन रहा है। विधाओं की परंपरागत सीमाएँ टूट रही हैं। इधर विधाओं के संदर्भ में यह सामान्य साहित्यिक प्रवृत्ति चलन में ...
Keywords: kolkhyan; hindi; कोलख्यान; राजेश; किस्सा; आलोचना
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[texts]आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी का आलोचना विवेक और इतिहास के सवाल - प्रफुल्ल कोलख्यान
हिंदी साहित्य का इतिहास और आलोचना प्रारंभ से ही धर्म और भक्ति के अंतर को नजरअंदाज करती आई है एवं दोनों को एक दूसरे का पर्याय मानकर विवेचन करती आई है। इस आधार पर होनेवाले विवेचन में स्वाभाविक र...
Keywords: कोलख्यान; हिंदी; आलोचना; हजारीप्रसाद; kolkhyan; hindi; Alochana
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[texts]बाकलम खुद कुमारिल खुद प्रभाकर हिंदी के नामवर - प्रफुल्ल कोलख्यान
वस्तुत: आलोचना का काम साहित्य और संस्कृति में सक्रिय अंधबिंदुओं की पहचान और साहित्य और संस्कृति के उपादानों के सहारे ही अंधबिंदुओं को निष्क्रिय कर दृष्टिबिंदुओं को सक्रिय बनाने का है। बहैस...
Keywords: कोलख्यान; नामवर; आलोचना; kolkhyan; namvar; alochana; hindi
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[texts]पुराने अंतर्विरोधों की नई जटिलताएँ - प्रफुल्ल कोलख्यान
‘विकास’ के आशय में ‘नैतिक-मूल्यों’ का नहीं, ‘क्षमताओं’ का तात्पर्य शामिल होता है। क्षमता का ही दूसरा नाम स्वतंत्रता है। नैतिकता और क्षमता में सहमेल होना चाहिए, लेकिन इनमें पुराना अंतर्विरो...
Keywords: kolkhyan; hindi; कोलख्यान; हिंदी; विचार; आलोचना
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[texts]यशपाल साहित्यः नैतिकता की सामाजिक तलाश - प्रफुल्ल कोलख्यान
महत्त्वपूर्ण साहित्य पाठक-दर-पाठक तो गतिमान बना ही रहता है, पीढ़ी-दर-पीढ़ी भी गतिमान बना रहता है। कहना न होगा कि प्रत्येक पीढ़ी साहित्य को नये सिरे से पढ़ती है। ऐसा करते हुए प्रत्येक पीढ़ी अपन...
Keywords: कोलख्यान; यशपाल; नैतिकता; समाज; kolkhyan; alochana; आलोचना
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[texts]कहानी का आसपास - प्रफुल्ल कोलख्यान
‘आकरों के आसपास’ में संकलित कुँवर नारायण की कहानियाँ, कहानी और कहानी के अपने प्रयोग में यथार्थ के अंतरंग तक संवेदना की पहुँच बनाने के कारण पहले से कहीं ज्यादा आज पठनीय है और यही इसका महत्त्व ह...
Keywords: कोलख्यान; कुँवरनारायण; कहानी; आलोचना; kolkhyan; hindi
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[texts]आलोचना की संस्कृति - प्रफुल्ल कोलख्यान
* जीवन-विवेक न उभय-निष्क्रियता की बात करता है और न निष्पक्षता की। ऐसा इसलिए कि विषम समाज अपनी निर्मिति में ही पक्षपातपूर्ण होता है। पक्षपातपूर्ण वातावरण में, निष्पक्षता चालू पक्षपातपूर्ण व्...
Keywords: कोलख्यान; आलोचना; संस्कृति; हिंदी; kolkhyan; hindi
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[texts]उत्तर-औपनिवेशिक वातावरण में वि-उपनिवेशन की उत्तर-कथा - प्रफुल्ल कोलख्यान
जिस संघर्ष के सामने आज का मनुष्य खड़ा है उस संघर्ष में अब शायद किसी बाइपास के लिए कोई जगह नहीं बची है। जगह बची भी हो तो उसके बरताव से बचने के संदेश को सांस्कृतिक संदर्भ में प्रस्तुत किया जाना अल...
Keywords: कोलख्यान; अलकासरावगी; कलिकथा; उपन्यास; आलोचना; kolkhyan
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[texts]कविता क्या संभव है - प्रफुल्ल कोलख्यान
कवियों की नाराजगी का खतरा मोल लेते हुए भी कहना जरूरी है कि समकालीन हिंदी कविता में आत्म-प्रेरणा और आत्म-प्रतिज्ञा का अपठ्य हो जाना बहुत ही दुखद है, खासकर तब जब हम यह देखते हैं कि कुछ समय पहले तक ...
Keywords: कोलख्यान; कविता; हिंदी; आलोचना; kolkhyan; kavita; hindi
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[texts]धर्मनिरपेक्ष राज्य और धर्म पर आधारित भारतीय समाज - प्रफुल्ल कोलख्यान
अर्थ के आधार पर बने बहुसंख्यक समाज की अंर्निहित प्रवणता के खतरों से अल्पसंख्यक समाज को बचाने, अर्थात गरीब लोगों के दबाव से अमीर लोगों को बचाने के वास्ते यह जरूरी हो जाता है कि ‘हम’ और ‘अन्य’ क...
Keywords: kolkhyan; कोलख्यान; धर्म; निरपेक्ष; हिंदी; hindi; आलोचना
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[texts]आलोचना विवेक और इतिहास के सवाल - प्रफुल्ल कोलख्यान
कई बार ऐसा प्रतीत होता है कि आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी  सत्य के बहुत करीब पहुँचकर भी सत्य से मुहँ फेर लेते हैं। शास्त्रीय संस्कार को इतिहास दृष्टि और आलोचना विवेक का अवरोधक मानने के अतिरि...
Keywords: कोलख्यान; आलोचना; हजारीप्रसाद; हिंदी; kolkhyan; hindi
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[texts]विचार, समाज और साहित्य - प्रफुल्ल कोलख्यान
कुछ विचारक जिन्हें हम उनकी तमाम भाव-भंगिमाओं और उछल-कूद के बावजूद साहित्यिक ही समझते हैं उनके खुद का दावा दार्शनिक होने का प्रतीत होता है और क्या पता वे हों भी! संक्षेप, में यहाँ हमारा आशय सिर्...
Keywords: कोलख्यान; विचार; समाज; साहित्य; आलोचना; kolkhyan
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[texts]हिंदी समाज में प्रेमचंद - प्रफुल्ल कोलख्यान
क्षेत्रीयतावाद और संप्रदायवाद दोनों सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की कोख में ही पलते हैं। इस समय एक राष्ट्र के रूप में भारत समकालीन राजनीति के फासीवादी रुझान और सामाजिक पिछड़ेपन की गिरफ्त में फँस...
Keywords: कोलख्यान; प्रेमचंद; आलोचना; समाज; premchand; hindi; kolkhyan
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[texts]विचारधारा के सवाल - प्रफुल्ल कोलख्यान
‘रोजगार’ इककीसवीं सदी की जनाकांक्षा का बीज शब्द है, और ‘मुनाफा’ बाजारवाद का मूल चरित्र। ‘मुनाफा’ और ‘रोजगार’ एक दूसरे के पूरक बनकर सभ्यता को मनोरम बना सकते हैं। ‘मुनाफा’ और ‘रोजगार’ को एक दू...
Keywords: कोलख्यान; विचारधारा; आलोचना; हिंदी; kolkhyan; hindi
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[texts]नामवर सिंहः सहज दृष्टि की जटिल वाग्मिता - प्रफुल्ल कोलख्यान
जीवन में रोटी बहुत जमीन घेरती है। रोटी खाने के बाद भी कुछ जमीन बची रहती है। इसी बची हुई जमीन पर सपनों का नाच होता है। अधिकतर लोग रोटी के साथ जमीन भी खाते हुए चलते हैं, और सपने ! सपनों का नाच खत्म हो...
Keywords: कोलख्यान; नामवर; आलोचना; kolkhyan; namvar; alochana; hindi
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[texts]माँ का क्या होगा - प्रफुल्ल कोलख्यान
मोह में फँसने से बचने के लिए ‘साग-मीट’ कहानी ‘जग्गाओं’ को उनकी अनिवार्य तार्किक परिणति के प्रति सचेत करती है तो ‘शामलालों’ के लोभी मन को ‘चीफ की दावत’ लज्जित करती है। सवाल पूछती है कि ‘माँ का ...
Keywords: कोलख्यान; कहानी; भीष्म; आलोचना; kolkhyan; हिंदी; hindi
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[texts]साहित्य का समाज शास्त्र ग्रंथित - प्रफुल्ल कोलख्यान
 हम ‘गोदान’ की नींद में नहीं टहलते, गोदान के सपनों की अंतर्यात्रा बार-बार करते हैं;जितनी बार यह अंतर्यात्रा करते हैं, उतनी बार सपनों का पुनर्सृजन करते हैं। सपनों को नींद से अलगाना कितना कठिन ह...
Keywords: कोलख्यान; हिंदी; समाज; शास्त्र; समाजशास्त्र; आलोचना; kolkhyan; hindi
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[texts]अभी समर शेष है - प्रफुल्ल कोलख्यान
सभ्यता और संस्कृति में स्वाभाविक गतिशीलता होती है। इस गतिशीलता को प्रगतिशीलता में बदलने की कोशिश भी जारी रहती है। इस गतिशीलता और प्रगतिशीलता से उत्पन्न बदलाव में स्वाभाविक क्रमिकता होती ह...
Keywords: कोलख्यान; हिंदी; साहित्य; आलोचना; लेख; kolkhyan; hindi; lekh
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[texts]स्त्री-विमर्शः विवेक को प्राण-प्राण पुकारती पुस्तक - प्रफुल्ल कोलख्यान
सब कुछ के बावजूद जितनी शीघ्रता से अपने चेहरे से झुर्रियों को उतार सकती हैं औरतें, उतार सकती हैं पूरी सभ्यता की सदियों की थकान वह किसी के भी मन में भरोसा और विश्वास पैदा कर सकता है। इसी भरोसे और ...
Keywords: कोलख्यान; हिंदी; आलोचना; स्त्री-विमर्श; kolkhyan; hindi; alochana
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[texts]दगा की, इस सभ्यता ने दगा की - प्रफुल्ल कोलख्यान
सभ्यता और संस्कृति में आनेवाले बदलाव के साथ जीवन की शैली में भी बदलाव आता है। यह बदलाव बाहरी भी होता है और आंतरिक भी। इस बदलाव को व्यवहार में लाये जानेवाले उपकरणों में भी देखा जा सकता है और उपक...
Keywords: कोलख्यान; हिंदी; युद्ध; आलोचना; kolkhyan; war; yudh; hindi
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[texts]कबीर साहित्य पर विचार - प्रफुल्ल कोलख्यान
कबीर में जितनी तेज अनुभव शक्ति थी, उतना ही प्रखर उनका विवेक था, साथ ही अनुभव और विवेक से समर्थित उतनी ही समृद्ध एवं गहरी आलोचनात्मक-अंतर्दृष्टि थी। इसी आलोचनात्मक-अंतर्दृष्टि से हासिल ‘आँखिन...
Keywords: कोलख्यान; कबीर; हिंदी; आलोचना; kolkhyan; kabir; hindi; akochana
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[texts]धर्म, राज्य और समाज - प्रफुल्ल कोलख्यान
दर्शन में विचार तर्क समर्थित ज्ञान के गर्भ में विकसित होता है। साहित्य में विचार, विवेक समर्थित संवेदना के गर्भ में विकसित होता है। जीवन में ज्ञान की बहुत बड़ी महिमा है। समाज इस ज्ञान का आदर क...
Keywords: कोलख्यान; धर्म; राज्य; समाज; आलोचना; हिंदी; hindi; kolkhyan
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